
हरदोई
हरपालपुर विकास खंड के इकनौरा गांव में स्थित 90 वर्ष प्राचीन मां सती मंदिर आज भी लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है। हर साल आषाढ़ पूर्णिमा पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है और मेले जैसा माहौल बन जाता है।
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार वर्ष 1932 में गांव निवासी छोटेलाल की बेटी रेशम देवी का विवाह सुरसा क्षेत्र के कसरावां गांव के वंशीधर से हुआ था। शादी के दो साल बाद ही 1934 में वंशीधर का देहांत हो गया। उस समय रेशम देवी मायके में थीं। पति की मृत्यु का समाचार मिलते ही उन्होंने ससुराल जाकर अंतिम संस्कार में शामिल होने का फैसला किया।
मान्यता है कि रास्ते में चचरापुर के पास बैलगाड़ी अचानक रुक गई। रेशम देवी ने कहा कि उनके पति की अर्थी इसी रास्ते से आ रही है। अगले दिन शव को राजघाट ले जाकर दाह संस्कार किया गया। इसके बाद परिजन रेशम देवी को वापस इक्कनौरा ले आए। यहां उन्होंने सती होने की इच्छा जताई। परिजनों ने उन्हें कमरे में बंद कर दिया, लेकिन कहा जाता है कि वहीं से उन्होंने कहा “अब मुझे जाने दो, नहीं तो पूरा घर जल जाएगा।”
बाद में परिजन और गांव वाले उन्हें गांव के बाहर एक बाग में ले गए। वहीं कुश के आसन पर बैठकर रेशम देवी ने सतीत्व का परिचय दिया। ग्रामीणों ने उसी स्थान पर 1934 में पूजा शुरू की और 1980 में सबके सहयोग से भव्य मंदिर बनवाया गया।
आज इसे “मां रेशमा देवी मंदिर” के नाम से जाना जाता है। यहां हर साल आषाढ़ पूर्णिमा पर विशाल मेला लगता है। दूर-दराज से श्रद्धालु मन्नत मांगने आते हैं। मान्यता है कि मां के दरबार से कोई भक्त निराश नहीं लौटता।
मंदिर परिसर में सैकड़ों घंटियां बंधी हैं और देवी की प्रतिमा को लाल वस्त्रों व आभूषणों से सजाया जाता है। इस दिन हवन, भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण का आयोजन भी किया जाता है।









