
संवाददाता अमृतपुर कुलदीप की रिपोर्ट
फर्रुखाबाद: उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में बेहतर शिक्षा के दावों के बीच एक ऐसी चूक सामने आई है, जिसने विभागीय सतर्कता पर सवालिया निशान लगा दिया है। जिले के अमृतपुर क्षेत्र में सरकारी स्कूल की कक्षा 5 की संस्कृत पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत-सुबोध’ में एक गंभीर प्रिंटिंग मिस्टेक उजागर हुई है। यह लापरवाही नए शैक्षणिक सत्र 2026-2027 के लिए वितरित की गई बिल्कुल नई किताबों में देखने को मिली है। पड़ताल में सामने आया कि किताब के तीसरे पाठ ‘वाक्यबोध: (द्वितीय:)’ में बच्चों को चित्रों के माध्यम से संस्कृत व्याकरण सिखाने का प्रयास किया गया है। पन्ने पर संस्कृत वाक्य लिखा है— “एते छत्रे स्तः” (अर्थात: ये दो छाते हैं)। नियमानुसार यहाँ दो छातों के चित्र होने चाहिए थे, लेकिन विभाग की लापरवाही देखिए कि छातों के स्थान पर नीले रंग के दो चौकोर डिब्बे (Boxes) छाप दिए गए हैं।
प्राइमरी स्तर पर बच्चे चित्रों को देखकर ही शब्दों की पहचान करना सीखते हैं। ‘छत्रे’ शब्द के सामने डिब्बे का चित्र होने से छोटे बच्चों के मन में शब्दों के अर्थ को लेकर भ्रम पैदा हो रहा है। सवाल यह उठता है कि जिस संस्कृत विषय को कठिन माना जाता है, उसे इस तरह की गलतियों के साथ पढ़ाकर विभाग बच्चों को क्या सिखाना चाहता है
इस बड़ी चूक पर स्थानीय अभिभावकों का गुस्सा फूट पड़ा है। उनका कहना है:
“एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया और निपुण भारत की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ बच्चों के हाथ में ऐसी त्रुटिपूर्ण किताबें थमा दी गई हैं। क्या विभाग इन किताबों को स्कूलों तक भेजने से पहले इनकी जांच (Proofreading) करना भी जरूरी नहीं समझता
यह सीधे तौर पर पब्लिकेशन हाउस और शिक्षा विभाग की प्रूफरीडिंग टीम की अक्षमता को दर्शाता है। सत्र 2026-27 की नई पुस्तकों में इस तरह की ‘ब्लंडर’ मिस्टेक बताती है कि बच्चों के भविष्य को लेकर विभाग कितना लापरवाह है। अब देखना यह होगा कि खबर सामने आने के बाद क्या इन किताबों को वापस लिया जाएगा या नौनिहाल इसी ‘गलत बोध’ के साथ पढ़ाई जारी रखने को मजबूर होंगे।









